दिल्ली के लाल किला मैदान से गूंजा जनजातीय अस्मिता का स्वर; मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बोले– “पूरी दुनिया को प्रकृति संग विकास सिखा सकता है आदिवासी समाज”

रायपुर/नई दिल्ली [24 मई 2026] | देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में रविवार को जनजातीय अस्मिता, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक चेतना का एक विराट और ऐतिहासिक संगम देखने को मिला। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के पावन अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय जनजाति सांस्कृतिक समागम में देशभर से हजारों जनजातीय प्रतिनिधि, युवा, सामाजिक कार्यकर्ता और पारंपरिक समुदायों के लोग एक मंच पर एकत्र हुए।

जनजाति सुरक्षा मंच एवं जनजाति जागृति समिति द्वारा आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वहीं, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की गरिमामयी उपस्थिति ने इस राष्ट्रीय आयोजन को विशेष महत्व प्रदान किया। मुख्यमंत्री श्री साय के साथ छत्तीसगढ़ सरकार के कैबिनेट मंत्री श्री केदार कश्यप एवं श्री रामविचार नेताम भी विशेष रूप से शामिल हुए। इस दौरान दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता ने भी कार्यक्रम स्थल पर मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय से सौजन्य भेंट की।
📍 पर्यावरण संकट से जूझ रही दुनिया को रास्ता दिखा सकता है जनजातीय जीवन दर्शन
देशभर से आए जनजातीय समाज के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा कि जनजातीय समाज केवल प्रकृति का रक्षक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का सबसे प्राचीन और जीवंत स्वरूप है। सदियों से जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते हुए इस समाज ने प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने का कार्य किया है। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट और असंतुलित विकास की चुनौतियों से जूझ रही है, तब जनजातीय जीवन दर्शन मानवता को टिकाऊ और प्रकृति-सम्मत विकास का असली रास्ता दिखा सकता है।
📍 छत्तीसगढ़ की 44 प्रतिशत हरियाली में बसती है जनजातीय संस्कृति
मुख्यमंत्री श्री साय ने छत्तीसगढ़ का गौरव रेखांकित करते हुए कहा कि राज्य का लगभग 44 प्रतिशत भू-भाग वनाच्छादित है, जो केवल प्राकृतिक संपदा का प्रतीक नहीं, बल्कि जनजातीय जीवन, संस्कृति और परंपरा का जीवंत आधार है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर राष्ट्र निर्माण तक जनजातीय समाज के अतुलनीय योगदान को याद करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा तथा छत्तीसगढ़ के अमर शहीद वीर नारायण सिंह जैसे महानायकों ने अपनी संस्कृति, स्वाभिमान और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष, साहस और बलिदान का जो अद्वितीय इतिहास रचा है, वह हमारी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है।
📍 ‘आदि परब’, ‘बस्तर पंडुम’ और देवगुड़ियों का हो रहा कायाकल्प
राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों को रेखांकित करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि:
- सांस्कृतिक पहचान: ‘आदि परब’, बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनजातीय प्रतिभा, परंपरा, खेलकौशल और पहचान को राष्ट्रीय मंच देने का सशक्त प्रयास हैं।
- आस्था केंद्रों का विकास: बस्तर से लेकर सरगुजा तक ‘देवगुड़ी’ जैसे पारंपरिक आस्था केंद्रों के संरक्षण और विकास का कार्य राज्य सरकार द्वारा संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता के साथ तेजी से किया जा रहा है।
📍 गोंडी, हल्बी और सादरी भाषा में प्रारंभिक शिक्षा देगी साय सरकार
संस्कृति की रक्षा में भाषा के महत्व पर विशेष जोर देते हुए मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने एक बड़ी घोषणा के तहत बताया कि किसी भी समाज की संस्कृति उसकी भाषा से जीवित रहती है। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार जनजातीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। राज्य में गोंडी, हल्बी और सादरी जैसी स्थानीय जनजातीय भाषाओं में बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा देने की दिशा में विशेष पहल की जा रही है, ताकि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा, सांस्कृतिक जड़ों और पारंपरिक ज्ञान से हमेशा जुड़ी रह सके।
लाल किला मैदान में आयोजित यह राष्ट्रीय समागम मांदर, ढोल, पारंपरिक लोकधुनों और विभिन्न राज्यों से आए जनजातीय कलाकारों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से गूंजता रहा, जो विविधता में एकता और भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का एक सशक्त घोष बनकर उभरा।